सेंटी गुरु ने चाय की पहली चुस्की ली, अखबार को ऐसे घूरा जैसे उसमें देश की सारी समस्याओं का ठेका छपा हो। फिर मूंछों पर ताव देकर बोले “गुरु! मक्खी कान पर भिनभिनाए तो उसे उड़ाइए, दीवार पर बैठे तो फूंक मारिए, मगर हथौड़ा लेकर मत दौड़ पड़िए। कहीं ऐसा न हो कि मक्खी तो उड़ जाए और दीवार के साथ अपना घर भी ढह जाए!”
अब गुरु की इस ज्ञानगंगा को हल्के में मत लीजिए। मामला जनसुविधा, नियम-कानून और व्यवस्था की मर्यादा का है। मेट्रो जैसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था लाखों लोगों के लिए महज रेलगाड़ी नहीं, बल्कि रोजी-रोटी, पढ़ाई, इलाज और समय पर घर पहुंचने की उम्मीद है। कोई दफ्तर पहुंचता है, कोई स्कूल, कोई अस्पताल और कोई मजदूरी करके परिवार की रसोई जलाने निकलता है। ऐसे में व्यवस्था से जुड़ा कोई विवाद खड़ा हो जाए, तो उसकी कीमत अक्सर वे लोग चुकाते हैं, जिनका उस विवाद से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता।
सेंटी गुरु बोले “भाई, कानून का सम्मान होना चाहिए, न्यायालय की गरिमा भी अक्षुण्ण रहनी चाहिए और प्रशासन को अपना दायित्व निभाने की पूरी छूट मिलनी चाहिए। मगर जनहित की फाइल पर जनता की परेशानी वाला पन्ना भी तो लगाइए! आखिर आम आदमी हर बार व्यवस्था की रस्साकशी में क्यों पिसे?”
गुरु का तंज यहीं नहीं रुका। बोले “हमारे यहां कभी-कभी छोटी-सी बात प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाती है। फिर समाधान की मेज पर बैठने के बजाय सब अपनी-अपनी कुर्सी कसकर पकड़ लेते हैं। न कोई झुकना चाहता है, न कोई सुनना चाहता है। उधर जनता स्टेशन पर खड़ी घड़ी देखती रहती है और इधर अहंकार अपनी रफ्तार से दौड़ता रहता है!”
सेंटी गुरु ने चाय का प्याला खाली किया और अंतिम पंच मारा “अरे भाई, विवाद सुलझाना है तो संवाद का दरवाजा खोलिए। नियम भी बचें, न्याय भी बचे और जनता की सुविधा भी। लोकतंत्र में अधिकारों की रक्षा जरूरी है, लेकिन आम आदमी को अनावश्यक परेशानी से बचाना भी उतना ही बड़ा धर्म है।”
गुरु की आखिरी सीख: मक्खी मारने के लिए हथौड़ा उठाने से पहले सोचिए—कहीं निशाना मक्खी पर और चोट जनता पर तो नहीं पड़ रही? क्योंकि साहब, जनता की सहनशीलता को सरकारी हथौड़ा समझने की भूल मत कीजिए। चोट जब हद से गुजरती है, तो भरोसे की दीवार में दरार पड़ ही जाती है!
सेंटी गुरु




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