13 अक्टूबर, 2026  |  01:27 IST
Jila Nazar
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026
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देवी आराधना, फिर नारी सम्मान की परीक्षा!

शारदीय नवरात्रि आते ही वातावरण भक्तिमय हो उठता है। मंदिरों में घंटियां गूंजने लगती हैं, घरों में माता की चौकी सजती है, गलियों में देवी गीत सुनाई देने लगते हैं और श्रद्धालु मां दुर्गा के नौ स्वरूपों क…

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देवी आराधना, फिर नारी  सम्मान की परीक्षा!

शारदीय नवरात्रि आते ही वातावरण भक्तिमय हो उठता है। मंदिरों में घंटियां गूंजने लगती हैं, घरों में माता की चौकी सजती है, गलियों में देवी गीत सुनाई देने लगते हैं और श्रद्धालु मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना में लीन हो जाते हैं। कहीं व्रत-उपवास हैं, कहीं कन्या पूजन, तो कहीं भव्य पंडालों में आस्था का सैलाब उमड़ता है। हर ओर एक ही उद्घोष सुनाई देता है

  जय माता दी!

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लेकिन इस भक्तिमय वातावरण के बीच एक सवाल मन को झकझोरता है। जिस देश में नारी को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में पूजने की परंपरा है, उसी समाज में बेटियों की सुरक्षा, महिलाओं के सम्मान और उनके अधिकारों के लिए आज भी संघर्ष क्यों करना पड़ता है?

विडंबना देखिए, नौ दिनों तक कन्याओं के पैर पखारकर उनका आशीर्वाद लेने वाला समाज कभी-कभी उन्हीं बेटियों के सपनों पर पहरे क्यों बिठा देता है? पूजा की थाली में चुनरी, रोली और मिठाई सजाने वाले हाथ यदि घर की बेटी की स्वतंत्रता, शिक्षा और निर्णय लेने के अधिकार को स्वीकार नहीं कर पाते, तो आस्था के इस उत्सव में कहीं न कहीं आत्ममंथन की गुंजाइश अवश्य है।

नवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और सामाजिक चेतना का अवसर भी है। मां दुर्गा का महिषासुर मर्दिनी स्वरूप हमें अन्याय, अहंकार और बुराइयों के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देता है। मां सरस्वती ज्ञान का महत्व समझाती हैं, तो मां लक्ष्मी श्रम, समृद्धि और खुशहाली का संदेश देती हैं। इन स्वरूपों की आराधना तभी सार्थक है, जब हमारा व्यवहार भी उनके आदर्शों के अनुरूप हो।

यह भी सच है कि समाज में अनेक परिवार बेटियों को आगे बढ़ाने, उन्हें शिक्षित करने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं। महिलाएं शिक्षा, विज्ञान, खेल, प्रशासन और राजनीति सहित हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं। ऐसे सकारात्मक बदलाव आशा जगाते हैं कि परंपरा और प्रगतिशील सोच साथ-साथ आगे बढ़ सकती हैं।

मां की सच्ची भक्ति मंदिर के दीपों के साथ मन के अंधकार को मिटाने में है। यदि नवरात्रि हमें किसी भूखी महिला को भोजन कराने, किसी जरूरतमंद बच्ची की शिक्षा में सहयोग देने, घरेलू हिंसा के विरुद्ध आवाज उठाने और बेटियों को बराबरी का अवसर देने की प्रेरणा देती है, तभी इस पर्व का वास्तविक अर्थ सामने आता है।

आइए, इस शारदीय नवरात्रि संकल्प लें कि देवी की आराधना के साथ नारी के सम्मान को भी अपने जीवन का धर्म बनाएंगे। क्योंकि मां दुर्गा की शक्ति का जयघोष तभी पूर्ण होगा, जब हर बेटी निर्भय होकर जी सकेगी और हर महिला सम्मान के साथ अपना जीवन जी पाएगी।

**जय माता दी!**

सन्त कुमार भारद्वाज

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jilanazar.com · सम्पादकीय डेस्क jilanazar.com की और खबरें →

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