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रविवार, 11 अक्टूबर 2026
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मोबाइल की स्क्रीन पर छिड़ा नया युद्ध

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मोबाइल की स्क्रीन पर छिड़ा नया युद्ध
सन्त कुमार भारद्वाज

आज युद्ध का अर्थ केवल सीमाओं पर सैनिकों की तैनाती, गोलियों की गूंज या मिसाइलों के प्रहार तक सीमित नहीं रह गया है। तकनीक के इस दौर में युद्ध का सबसे खतरनाक मोर्चा हमारी हथेली में मौजूद मोबाइल फोन बन चुका है। झूठी खबरें, फर्जी वीडियो, डीपफेक और सोशल मीडिया पर फैलाया जाने वाला दुष्प्रचार अब किसी भी देश की सामाजिक एकता, लोकतांत्रिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के लिए यह चुनौती और भी गंभीर है। करोड़ों लोग प्रतिदिन सोशल मीडिया के माध्यम से सूचनाएं प्राप्त करते हैं और बिना सत्यापन के उन्हें आगे भी भेज देते हैं। यही लापरवाही कई बार अफवाहों को सच का रूप दे देती है। सांप्रदायिक तनाव, भीड़ हिंसा, चुनावी माहौल या किसी राष्ट्रीय संकट के दौरान फैलने वाला दुष्प्रचार समाज में अविश्वास और विभाजन की खाई गहरी कर देता है। विदेशी तत्व भी इसी कमजोरी का लाभ उठाकर भारत की सामाजिक समरसता को चोट पहुंचाने का प्रयास करते हैं।

निस्संदेह सरकार ने साइबर सुरक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी नियमों और फर्जी सामग्री पर अंकुश लगाने के लिए अनेक कदम उठाए हैं। लेकिन केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा। जब तक नागरिक स्वयं डिजिटल रूप से जागरूक नहीं बनेंगे, तब तक इस अदृश्य युद्ध में जीत संभव नहीं है। हर संदेश को सत्य मान लेना, बिना जांचे साझा करना और भावनाओं में बहकर प्रतिक्रिया देना, अनजाने में दुष्प्रचार करने वालों की सहायता करना है। समय की मांग है कि डिजिटल साक्षरता को राष्ट्रीय अभियान बनाया जाए। विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों और समाज के हर वर्ग तक तथ्य-जांच की संस्कृति विकसित करनी होगी।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जागरूक नागरिक होते हैं, न कि वायरल संदेश। भारत की सीमाओं की रक्षा हमारे सैनिक करते हैं, लेकिन देश के सामाजिक ताने-बाने की रक्षा प्रत्येक नागरिक के हाथ में है। यदि हम सत्य और असत्य में अंतर करने की क्षमता विकसित कर लें, तो कोई भी डिजिटल षड्यंत्र हमारी राष्ट्रीय एकता को कमजोर नहीं कर सकेगा। आधुनिक भारत की सुरक्षा अब सीमा चौकियों के साथ-साथ हर मोबाइल स्क्रीन पर भी तय हो रही है।

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