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Jila Nazar
रविवार, 11 अक्टूबर 2026
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‘दिमागी नक्सल’ पर बहस: लेखक की नजर में चिंता वाजिब, पर असहमति अपराध नहीं

डॉ समरेन्द्र शर्मा के लेख में प्रधानमंत्री की टिप्पणी को बस्तर के संदर्भ में परखा गया है और लोकतांत्रिक सीमाओं की याद दिलाई गई है।

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‘दिमागी नक्सल’ पर बहस: लेखक की नजर में चिंता वाजिब, पर असहमति अपराध नहीं
प्रतीकात्मक चित्र: Eugene Ormandy / CC BY-SA 4.0 / Wikimedia Commons

लेखक डॉ समरेन्द्र शर्मा के अनुसार लाल किले से प्रधानमंत्री ने कहा था कि हथियारबंद नक्सलवाद समाप्ति की ओर है, पर अब ‘दिमागी नक्सल’ को पहचानना होगा। लेखक मानते हैं कि यह केवल सुरक्षा की नहीं, भविष्य की वैचारिक बहस की ओर भी इशारा है।

लेख में कहा गया है कि बस्तर ने दशकों हिंसा झेली, पर अब हालात बदले हैं। लेखक के मत में इसका श्रेय सिर्फ सुरक्षा अभियान को नहीं, खुफिया तंत्र, आत्मसमर्पण नीति, पुनर्वास और विकास को भी जाता है। वे हर आत्मसमर्पण को एक ही नजर से देखने को सरलीकरण बताते हैं।

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लेखक का तर्क है कि सशस्त्र आंदोलन को विचार, धन और नेटवर्क भी चलाते हैं, इसलिए राज्य का चिंतित होना जायज है और हिंसा के लिए धन या भर्ती जुटाने वालों पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

साथ ही उनका कहना है कि ‘दिमागी नक्सल’ कोई कानूनी श्रेणी नहीं है। पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता या छात्र की असहमति को नक्सलवाद नहीं माना जा सकता, क्योंकि लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार है।

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जिला नज़र डेस्क · सम्पादकीय डेस्क

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