लेखक डॉ समरेन्द्र शर्मा के अनुसार लाल किले से प्रधानमंत्री ने कहा था कि हथियारबंद नक्सलवाद समाप्ति की ओर है, पर अब ‘दिमागी नक्सल’ को पहचानना होगा। लेखक मानते हैं कि यह केवल सुरक्षा की नहीं, भविष्य की वैचारिक बहस की ओर भी इशारा है।
लेख में कहा गया है कि बस्तर ने दशकों हिंसा झेली, पर अब हालात बदले हैं। लेखक के मत में इसका श्रेय सिर्फ सुरक्षा अभियान को नहीं, खुफिया तंत्र, आत्मसमर्पण नीति, पुनर्वास और विकास को भी जाता है। वे हर आत्मसमर्पण को एक ही नजर से देखने को सरलीकरण बताते हैं।
लेखक का तर्क है कि सशस्त्र आंदोलन को विचार, धन और नेटवर्क भी चलाते हैं, इसलिए राज्य का चिंतित होना जायज है और हिंसा के लिए धन या भर्ती जुटाने वालों पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
साथ ही उनका कहना है कि ‘दिमागी नक्सल’ कोई कानूनी श्रेणी नहीं है। पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता या छात्र की असहमति को नक्सलवाद नहीं माना जा सकता, क्योंकि लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार है।




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