बरसात की उस रात केवल बादल नहीं बरसे थे, सत्ता के दावों का रंग भी बह गया था। पानी ने सिर्फ लकड़ियों को नहीं भिगोया, बल्कि उन भाषणों, शिलान्यासों और विकास के नारों की चमक भी धो डाली, जो वर्षों से गांवों की चौपालों में गूंजते रहे हैं। धिमिश्री के श्मशान में बुझी एक चिता ने ऐसा प्रश्न खड़ा कर दिया, जिसका उत्तर किसी सरकारी विज्ञापन, किसी मंचीय भाषण या किसी चुनावी घोषणा में नहीं मिलता।
कहा जाता है कि विकास गांव के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच चुका है। लेकिन जब किसी परिवार को अपने प्रियजन का अंतिम संस्कार भी सम्मानपूर्वक करने का अधिकार न मिले, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर विकास पहुंचा कहां? जिस श्मशान में एक साधारण टीनशेड तक नहीं, वहां करोड़ों की योजनाओं का गुणगान ग्रामीणों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा प्रतीत होता है।
सबसे अधिक पीड़ा उस दृश्य ने दी, जब मूसलाधार बारिश ने जलती चिता को बुझा दिया। परिजनों की आंखों में आंसू थे, कंधों पर जिम्मेदारियां थीं और सामने व्यवस्था की असफलता खड़ी थी। अगले दिन फिर लकड़ियां खरीदी गईं, फिर चिता सजाई गई और फिर अंतिम संस्कार हुआ। यह केवल एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि उस विकास मॉडल की विफलता का प्रतीक है, जिसमें चमकते भवन तो बन जाते हैं, लेकिन श्मशान की छत भूल जाती है।
ग्रामीणों का दर्द किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का विषय नहीं है। उनका प्रश्न सीधा है–जब चुनाव के समय हर गली तक जनप्रतिनिधियों के कदम पहुंच सकते हैं, तो श्मशान तक विकास की एक छोटी-सी छत क्यों नहीं पहुंची? क्या अंतिम यात्रा की गरिमा किसी योजना की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए? विकास केवल सड़कों, स्वागत द्वारों और उद्घाटनों का नाम नहीं है। विकास वह है, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य की गरिमा की रक्षा करे। यदि किसी गांव में अंतिम संस्कार जैसी संवेदनशील घड़ी भी प्राकृतिक विपदा के भरोसे छोड़ दी जाए, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता का प्रमाण है। आज आवश्यकता आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, आत्ममंथन की है। सत्ता और जनप्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि ग्रामीण भारत केवल चुनावी आंकड़ा नहीं, बल्कि भावनाओं का जीवंत संसार है। वहां श्मशान की छत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना किसी शहर का फ्लाईओवर।




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