नई दिल्ली। रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर दबाव बनाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों पर अब दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लग रहे हैं। ऊर्जा जरूरतों और घरेलू बाजार की परिस्थितियों के बीच अमेरिका का रुख बदलता है, तो भारत के लिए भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने का सवाल अहम हो जाता है। हालांकि, रूस से अमेरिकी डीजल खरीद और संबंधित लाइसेंस को लेकर किए गए दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इस दौरान भारत ने अपनी विशाल आबादी की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और लागत नियंत्रित रखने के लिए रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदना जारी रखा। इस नीति को लेकर वाशिंगटन ने कई बार आपत्ति जताई और भारत पर आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश की।
अब यदि अमेरिका भी अपनी घरेलू जरूरतों, ईंधन की कीमतों और आर्थिक हितों को देखते हुए रूसी पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद की अनुमति देता है, तो उसकी प्रतिबंध नीति की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर जो कदम अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था के हित में उचित मानता है, उसे भारत की ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में गलत कैसे ठहराया जा सकता है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर जोर देता रहा है। भारत का स्पष्ट दृष्टिकोण है कि विदेश नीति और ऊर्जा आयात के फैसले राष्ट्रीय हितों, बाजार की परिस्थितियों तथा देश की जरूरतों के आधार पर होने चाहिए।
ऐसी स्थिति में भारत अमेरिका के साथ व्यापारिक और कूटनीतिक वार्ताओं में समान मापदंड अपनाने की मांग उठा सकता है। साथ ही, रूस सहित विभिन्न देशों से ऊर्जा आपूर्ति के विकल्प खुले रखना भारत की रणनीतिक जरूरत है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सिद्धांतों की परीक्षा अक्सर आर्थिक हितों के सामने होती है। यदि अमेरिका अपने हितों के लिए नीतियों में लचीलापन दिखाता है, तो भारत को भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा के फैसले स्वतंत्र रूप से लेने का पूरा अधिकार है। यही भारत की कूटनीतिक मजबूती और रणनीतिक स्वायत्तता की असली कसौटी होगी।




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