अरे भइया! आज भोले चौराहे पर खड़ा-खड़ा देश की सड़कें निहार रहा था। तभी एक कार आई... आगे मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था–प्रेस । पीछे शीशे पर चमक रहा था–पुलिस । और डैशबोर्ड पर तिरंगे के साथ आर्मी का स्टिकर भी मुस्कुरा रहा था। भोले ने सोचा, वाह! लगता है लोकतंत्र, कानून और देशभक्ति तीनों एक ही गाड़ी में सफर कर रहे हैं।
पास जाकर देखा तो साहब परिवार समेत शादी में जा रहे थे। तब भोले के मुंह से निकला–वाह रे भारत! यहां पहचान नहीं, स्टिकर सफर करता है।
आज देश की सड़कों पर गाड़ियों से ज्यादा पहचान के बोर्ड दौड़ रहे हैं। किसी के बोनट पर प्रेस चिपका है, किसी के शीशे पर पुलिस, तो किसी की नंबर प्लेट के ऊपर आर्मी ऐसे चमक रही है, मानो ट्रैफिक नियमों से आजादी का सरकारी लाइसेंस मिल गया हो।
भोले पूछता है, क्या स्टिकर लगते ही गाड़ी वीआईपी हो जाती है? क्या प्रेस लिख देने से हर लालबत्ती हरी हो जाती है? क्या पुलिस लिखते ही हेलमेट, सीट बेल्ट और चालान छुट्टी पर चले जाते हैं?
दिक्कत सिर्फ दिखावे की नहीं है। असली खतरा तब पैदा होता है जब यही नकली पहचान असली अपराध की ढाल बन जाती है। अपराधी सम्मानित संस्थाओं के नाम का इस्तेमाल कर लोगों का भरोसा जीतते हैं, जांच से बचने की कोशिश करते हैं और कानून को आंख दिखाते हैं। बदनामी होती है उन पत्रकारों, पुलिसकर्मियों और सैनिकों की, जिन्होंने अपनी पहचान मेहनत, ईमानदारी और सेवा से बनाई है।
अब कई जगह ऐसे वाहनों की जांच की बातें हो रही हैं। लेकिन भोले कहता है, जांच केवल स्टिकर की नहीं, नीयत की भी होनी चाहिए। कार्रवाई केवल आम आदमी पर नहीं, उन रसूखदारों पर भी हो जो प्रभाव दिखाने के लिए सरकारी पहचान को निजी शोभा बना लेते हैं।
–आजकल कुछ लोग गाड़ी पर प्रेस ऐसे लिखवाते हैं जैसे डॉक्टर की डिग्री हो, पुलिस ऐसे चिपकाते हैं जैसे रिश्तेदारी का प्रमाणपत्र हो, और आर्मी ऐसे सजाते हैं जैसे देशभक्ति भी अब बाजार में मिलने लगी हो।
देश में सबसे सस्ती चीज अगर कोई बची है, तो वह कुछ लोगों के लिए स्टिकर वाली शान है। असली पहचान पसीने से बनती है, प्रिंटर से नहीं। बोनट पर चाहे जितना बड़ा प्रेस या पुलिस लिखवा लो, कानून की नजर आखिर नंबर प्लेट ही पढ़ती है।




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